अविपत्तिकर चूर्ण एक आयुर्वेदिक औषधि है जो कि भारत का परंपरागत औषधि है, जिसका प्रयोग पाचन और उत्सर्जन मैं किया जाता है यह जठरांत्र संबंधित मा...
अविपत्तिकर चूर्ण एक आयुर्वेदिक औषधि है जो कि भारत का परंपरागत औषधि है, जिसका प्रयोग पाचन और उत्सर्जन मैं किया जाता है यह जठरांत्र संबंधित मार्ग में एसिड श्राव को रोकता है और पाचन एंजाइम के उत्पादन को बढ़ावा देता है जो पोषक तत्वों के अवशोषण में सहायता करते हैं। अविपत्तिकर चूर्ण में मजबूत कार्मिनेटिव, antioxidant और anti inflammatory property पाए जाते हैं। जो पित्त दोष से संबंधित असंतुलन को ठीक करने में सहायता करते हैं। यह दस्त, कब्ज, गैस्ट्राइटिस, अपच और अल्सर सहित पाचन समस्याओं का इलाज करने में बहुत मददगार है। आयुर्वेद में अविपत्तिकर का अर्थ है पाचन विकार से छुटकारा पाना। अविपत्तिकर चूर्ण महर्षि अगस्त्य के द्वारा बनाया गया।
सामाग्री (Ingredients)
अविपत्तिकर चूर्ण का निर्माण निम्नलिखित चीजों को मिलाकर किया जाता है-
1. त्रिकटु - 1 part each
2. त्रिफला - 1 part each
3. मुस्ता - 1 part
4. विडलवंग - 1 part
5. विडंग - 1 part
6. सूक्ष्म एला - 1 part
7. तेज पत्र - 1 part
8. लवंग - 11 part
9. त्रिवृत - 44 part
10. शर्करा - 66 part
बनाने की विधि ( method of preparation)
ऊपर दिए गए सभी आयुर्वेदिक औषधियों को समान मात्रा में पीस करके पाउडर बना लेना है, और शर्करा का पाउडर नहीं बनाना है। और सभी पाउडर को मिक्स करके एक मुंह बंद कंटेनर में भर कर के रख लेना है यह सफेद कलर का पाउडर, मधुर रस के साथ लवंग के जैसा खुशबूदार पाउडर बन जाएगा
मात्रा( Doses)
8 ग्राम पाउडर या चूर्ण खाना खाने से पहले या फिर खाना खाने के बीच में ठंडे पानी या धारोष्ण दुध या कच्चे नारियल के जल के साथ लेना चाहिए। यह दिन में दो बार लेना चाहिए और आवश्यकता हो तो रात को सोते समय भी दे सकते है, या किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक के सलाह अनुसार खाना चाहिए।
उपयोग
आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार, स्वास्थ्य समस्याएं अक्सर 3 दोषो में असंतुलन के कारण होती है। अविपत्तिकर चूर्ण का उपयोग अक्सर पित्त के रूप में जाने जाने वाले दोष मैं असंतुलन का इलाज करने के लिए उपयोग किया जाता है और, बदले में निम्न स्वास्थ्य स्थितियों से उपचार को बढ़ावा देते हैं। अविपत्तिकर चूर्ण मुख्यतः
• अम्लपित्त,
• मलमूत्र विवंध,
• अग्निमांद्य रोग,
• 20 प्रकार के प्रमेह रोग,
• शूल रोग,
• अर्श रोग,
• गैस्ट्राइटिस
• GERD
अम्ल पित्त और शूल रोग में पहले इस चूर्ण से विरेचन करा कर पीछे से अन्य दवा देने से अच्छा लाभ होता है। यह पैत्तिक विकारों के लिए बहुत उपयोगी है अम्ल पित्त में पित्त की विकृति से ही यह रोग बढ़ता है उस विकृति को दूर करने के लिए यह चूर्ण का उपयोग किया जाता है यह विरेचन होने के कारण दस्त भी साफ लाता है और कब्जियत दूर करता है इस चूर्ण के सेवन से जठराग्नि प्रदीप्त हो भूख खूब लगती है। आदि रोगों को ठीक करने के लिए प्रयोग किया जाता है।